देहरादून। 13 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड की लोक भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में आज राजधानी देहरादून में एक ऐतिहासिक पहल की शुरुआत हुई। AiSE-AI Strategic Engineering Foundation, देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय (DBUU) और प्रदेश की लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित जागर एकेडमी के बीच ‘भाषा AI पहल’ के तहत एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
यह MoU केवल एक औपचारिक समझौता नहीं, बल्कि उत्तराखंड की तीन प्रमुख भाषाओं- गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को डिजिटल विलुप्ति से बचाने का एक संकल्प है। इस पहल के तहत AiSE फाउंडेशन द्वारा एक विशेष वॉइस कलेक्शन पोर्टल लॉन्च किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य प्रदेश के सुदूर गांवों से मूल वक्ताओं की आवाजें, लोकगीत, जागर, पवाड़े, कहावतें और मौखिक परंपराओं का वैज्ञानिक रूप से संग्रह करना है।
भाषा AI, AiSE फाउंडेशन: भाषा AI, AiSE फाउंडेशन का फ्लैगशिप प्रोजेक्ट है, जिसके तहत उत्तराखंड की बोलियों को AI के लिए तैयार किया जा रहा है। वर्तमान में दुनिया की अधिकांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक अंग्रेजी और हिंदी तक सीमित है। इस प्रोजेक्ट के बाद गढ़वाली-कुमाऊँनी-जौनसारी में भी वॉइस असिस्टेंट, ट्रांसलेशन और डिजिटल कंटेंट बनाना संभव हो पाएगा। इस डेटा को भविष्य में उत्तराखंड सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं और डिजिटल सेवाओं में उपयोग किया जाएगा।मैंने
खुद देखा है कि हमारे बच्चे अब अपनी मातृभाषा में बात करने में झिझकते हैं। अगर हमने आज अपनी भाषाओं को AI के लिए तैयार नहीं किया, तो अगले 10 साल में ये भाषाएं इंटरनेट की दुनिया से गायब हो जाएंगी। हमारा सपना है कि एक दिन हमारा पहाड़ का बच्चा भी अपने फोन से गढ़वाली में सवाल पूछे और AI उसी की भाषा में जवाब दे। यह तकनीक और संस्कृति का संगम है। DBUU के साथ यह साझेदारी हमें वो तकनीकी ताकत देगी जो इस सपने को हकीकत में बदल सके। यह MoU सेवा संकल्प फाउंडेशन के नैतिक सहयोग से जन-आंदोलन बनेगा।
– श्री सचिदानंद सेमवाल, संस्थापक, AiSE फाउंडेशन व AI आर्किटेक्ट
छात्रों को अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका देगा: अमन बंसल
देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष श्री अमन बंसल जी ने कहा कि DBUU में हम हमेशा मानते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि समाज के लिए कुछ करना भी है। भाषा AI प्रोजेक्ट इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। यह हमारे छात्रों को किताबों से बाहर निकलकर अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका देगा। हमारे AI लैब, इनोवेशन सेंटर, रिकॉर्डिंग स्टूडियो और हजारों टेक्निकल छात्र इस मिशन में AiSE और पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जी की टीम के साथ काम करेंगे। हमारे लिए यह गर्व की बात है कि हमारे विश्वविद्यालय के छात्र उत्तराखंड की भाषाई क्रांति का हिस्सा बन रहे हैं।”
MoU की मुख्य बातें:
व्यापक डेटा संग्रह: गढ़वाल के टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, पौड़ी, कुमाऊं और जौनसार-बावर क्षेत्र के गांवों से प्रामाणिक वॉइस सैंपल एकत्र किए जाएंगे।
छात्रों की सक्रिय भागीदारी: DBUU के B.Tech CSE, AI/ML, MCA, BCA के छात्र वॉलंटियर्स के रूप में डेटा एनोटेशन, ट्रांसक्रिप्शन और वैलिडेशन का कार्य करेंगे और उन्हें इंटर्नशिप क्रेडिट और प्रमाणपत्र प्रदान किए जाएंगे।
सांस्कृतिक प्रमाणिकता: पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जी के नेतृत्व वाली जागर एकेडमी लोकगीतों, उच्चारण और बोली के विभिन्न रूपों की सांस्कृतिक शुद्धता सुनिश्चित करेगी।
तकनीकी संसाधन: DBUU अपने AI लैब, कंप्यूटर लैब और सभागार को वर्कशॉप और बूटकैंप के लिए उपलब्ध कराएगा, जबकि AiSE फाउंडेशन पूरा तकनीकी फ्रेमवर्क और पोर्टल उपलब्ध कराएगा।
ओपन-सोर्स पहल: तैयार किया गया पूरा डेटासेट और लैंग्वेज मॉडल जनहित और उत्तराखंड सरकार के उपयोग के लिए ओपन-सोर्स के रूप में उपलब्ध होगा।
न प्रमुख लोगों की रही मौजूदगी: इस ऐतिहासिक अवसर पर DBUU के कुलपति, उपाध्यक्ष श्री अमन बंसल जी, AiSE फाउंडेशन के संस्थापक श्री सचिदानंद सेमवाल, श्री गजेंद्र नौटियाल, AiSE फाउंडेशन की कोर टीम, जागर एकेडमी के प्रतिनिधि तथा DBUU की एक्जीक्यूटिव टीम और वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि उत्तराखंड की भाषाओं को बचाने के इस मिशन को पूरे प्रदेश में एक जन-आंदोलन बनाया जाएगा और जल्द ही माननीय मुख्यमंत्री जी द्वारा वॉइस कलेक्शन पोर्टल का औपचारिक शुभारंभ किया जाएगा।










